बुद्धिजीवी.....

                                       बुद्धिजीवी.....     
बुद्धिजीवीओं के गिरोह का इस समय बडा आतंक है,दहशत है और चारों तरफ इन्हीं के नाम की धमक है। एक ज़माना था जब चंबल में डाकू होते थे अब तो ठंड के इस मौसम में कंबल में डाकू हैं और वे यही बुद्धिजीवी हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता कि कौन बुद्धिजीवी है। आप जिससे बडी दोस्ती से,यारी से,प्यार से बात कर रहे हैं हो सकता है कि वही बुद्धिजीवी निकल जाए---कुछ नहीं कहा जा सकता,कोई भी बुद्धिजीवी निकल सकता है। चंबल के डाकुओं और इन बुद्धिजीवियों में कुछ समानताएं हैं और वह यह कि दोनों लूटने का काम करते हैं। दोनों भेस बदलते रहते हैं हां एक बात जरूर है कि डाकुओं की ये नई किस्म पुराने और असल डाकुओं से ज्यादा खूंखार,घातक और बहुरुपिया है। पहले डाकू घोडे पर चढ़ कर आते थे और उनके नाम में भी डाकुओं वाली अकड़  होती थी जैसे गब्बर सिंह,सुल्ताना,डाकू मंगल सिंह वगैरह। अबके इन डाकुओं के नाम में तो अकड नहीं होती लेकिन वे इन डाकुओं से भी ज्यादा खतरनाक हैं। उनके नाम तो बड़े मधुर और संगीत की धुन की तरह हो सकते हैं दरअसल यही उनका ट्रेड मार्क भी होता है। वे कलाकारों जैसा नाम रखते हैं भले ही उनके बाप दादाओं का कला से कोई वास्ता न रहा हो पर वे ऐसा नाम रखना जरूरी मानते हैं। पहले के डाकुओं की एक वेशभूषा होती थी जैसे बड़े -बड़े  बाल और दाढ़ी मूंछ,दो या चार जेबों वाली बडी शर्ट और धोती,शर्ट के उपर एक बेल्ट जिसमें कारतूस फंसे होते थे और एक बड़ी सी बंदूक कंधे पर लटकी होती थी। इन नए डाकुओं की भी बहुधा एक वेशभूषा  होती है, ये भी बड़े  बाल रखते हैं,दाढी भी रखते हैं और अधिकतर जीन्स की पेंट के उपर एक कुर्ता पहनते हुए पाए जाते हैं। महिलाएं भी इस गिरोह की सक्रिय बल्कि कभी कभी सर्वाधिक सक्रिय सदस्य होती हैं और पेंट कुर्ते में ही पाई जाती हैं। आप कह सकते हैं कि आखिर ये नए किस्म के डाकू क्या करते हैं और यह कि मैं इन बुद्धिजीवियों को डाकू क्यों कह रहा हूं तो मैं आपके इस सवाल का जवाब देता हूं-देखिये! जैसे डाकू सोना-चांदी,हीरे-जवाहरात वगैरह लूटते थे वैसे ही ये डाकू आपका चैन लूट लेते हैं आपके विचारों में सेंध लगाते हैं और आपको पता ही नहीं चलता। ये कभी -कभी पूरी नस्ल और पूरे देश  को ही मानसिक रूप से भ्रमित करने का,कंगाल करने का षडयंत्र चलाते हैं और उसमें सफल भी हो जाते हैं। इनका गिरोह पूरे देश  में फैला हुआ है और इनका अघोषित संगठन है और इस संगठन के अपने नियम कानून और कायदे हैं जैसे कि हर गिरोह के होते हैं। इनमें भी सरदार होते हैं। सरदार होने के लिए भी कुछ योग्यताएं चाहिये होती हैं। आप ज्यादा पढ़े लिखे हैं तो इसी आधार पर आप सरदार बन जाएं ऐसा नहीं हो सकता कुछ और भी आपमें होना चाहिये। आप अगर जाति से ब्राम्हण  हैं तो आपको ब्राम्हणों को गाली देना होगा,हिंदू हैं तो हिंदू देवी-देवताओं को गाली बककर मुसलमानों या दूूसरे धर्म के पीर पैगम्बरों को अधिक उदार और प्रगतिशील दिखाने के लिए हमेशा  आगे आना होगा। आपके पास तर्कों का भंडार होना चाहिये ताकि अपनी हर गलत बात को आप अपनी सुविधानुसार फोल्ड कर उसे तर्क की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकें। आपके पास डाटा बैंक होना चाहिये और सबसे बड़ी  बात कि आप को सत्य को अनसुना करने के लिए उसे दकियानूसी सिद्ध करने का साहस होना चाहिये,आपको यह पक्का विश्वास  होना चाहिये कि अंतिम सत्य वही है जो आपने और आपके संगी साथियों ने जाना है। इस दुनिया का सारा इतिहास कबाड़  है अगर वह रोमिला थापर और उन्हीं जैसी दूसरी विभूतियों ने नहीं लिखा। आपमें साहस होना चाहिये कि आप कह सकें कि राम का कोई अस्तित्व ही नहीं है बल्कि वे एक कपोल कल्पना हैं। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाए तो आपको यह सिद्ध करने में जुट जाना चाहिये कि न्यायपालिका बिकाउ है और हिन्दुत्ववादी शक्तियों के हाथ की कठपुतली है। आप भले बिना पूजा किए घर से बाहर ना निकलते हों पर आपमें यह हिम्मत होनी चाहिये कि आप पूजा-पाठ को ढकोसला और ऐसा करने वालों को पोंगापंथी कहें। ऐसे ही कई और पैमाने हैं जिनकी कसौटी पर आप खरे उतरते जाइये और धीरे-धीरे इस गिरोह के स्वयंभू सरगना बनते जाइये........।
हो गए न आपके हाथ-पांव ढीले!!! क्या सोच रहे थे कि आसान है इस गिरोह का सरगना होना!!! आप में अगर इस राह पर चलने का साहस है तो आप पक्के बुद्धिजीवी बनने लायक हो। बुद्धिजीवी की और भी कई विशेषताएं होती हैं -वह उन सभी कामों और शब्दों का खुलकर उच्चारण करता है जिसे आमतौर पर हम वर्जनाओं की परिधि में रखते हैं जैसे हम कहेंगे कि हम लघु शंका करके आते हैं या हमें दीर्घ शंका के लिए जाना है तो बुद्धिजीवि इसे पिछड़ेपन  की निशानी मानेगा वह कहेगा हमें मूतने जाना है या हगने जाना है। वह अश्लीलता  को जीवन का सबसे बडा सच मानता है और चाहता है कि साहित्य और सिनेमा वगैरह में यह सब खुले आम दिखाया जाना चाहिये। सब लोग जिसे अश्लील  कहेंगे बुद्धिजीवी उसमें जीवन का सौन्दर्य देखेगा। इसे वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहता है। अगर इंटरनेट पर अश्लील  साइट्स ब्लाॅक कर दी जाएं तो वह इसे सरकार का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ दमन चक्र कहकर शोर मचाएगा। कोई भी ऐसी बात जो उसकी मान्यता या विचार को चुनौती देती हो उसे वह यह कहकर खारिज कर देता है कि यह दक्षिणपंथी है,प्रगतिकामी नहीं है और सबसे ख़ास बात यह कि वह दिखे भले ही कैसा भी भीतर से हमेशा  शिकार की मुद्रा में रहता है और मौका मिलते ही किसी भी पद को,सम्मान को उछल
कर झपट लेता है और फिर शांति की मुद्रा में आ जाता है। वह अपना परम कर्तव्य मानता है ऐसे अवसरों को सूंघना और उन्हें हथियाना जो उसे पद,प्रतिष्ठा और धन दिला सकें, ये मिल जाएं तो वह अपनी सारी आइडियाॅलाॅजी को पुंगी  बनाकर ----घुसेड लेता है नहीं तो उसकी बंदूक बनाकर इस पर उस पर तानता रहता है.......बुद्धिजीवी बनना इतना आसान भी नहीं है...... .......कि है....?
-धीरेन्द्र शुक्ल

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